Saakhi – Bhai Jodh Devta Ka Bhoot

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Saakhi - Bhai Jodh Devta Ka Bhoot

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भाई जोध देवता का भूत

भाई जोध देवता श्री गुरु अंगद देव जी के समय हुए थे। ये ऊँची गोत्र के ब्राह्मण थे। इनमें जाति का अहंकार भी बहुत अधिक था। इसी अहंकार के चलते ये दूसरी जातियों वालों को नीचा समझा करते थे और उनसे नफरत किया करते थे। दूसरे को बुरा और नीचा समझने वाले, नफरत करने वाले अहंकारी व्यक्तियों का मन कभी शांत और सुखी नहीं होता, वह जलता सड़ता और भटकता ही रहता है। यही हाल जोध ब्राह्मण का था।

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उसका भाग्य जाग उठा। वह अपने मन की हालत से तंग आ गया। उसके मन में ईच्छा पैदा हुई कि सुख और शान्ति प्राप्त हो तो ठीक है। उसे श्री गुरु नानक देव जी की गद्दी पर विराजमान गुरू अंगद देव जी के बारे में जानकारी मिली। उसे पता चला कि गुरू जी के दरबार में दुखियों के दु:ख दूर हो जाते हैं और उनके मन, सुख और शान्ति से भरपूर हो जाते हैं। यह बात सुन कर वह खडूर साहिब जा पहुँचा। उसने गुरू जी को माथा टेका और लंगर की सेवा में जुट गया।

पढ़ा -लिखा होने के चलते वह लंगर के लिए आई रसद, धन का लेखा भी रखता था। उसका यह प्रयास रहता था कि यह रसद और माया बेकार न जाये, बल्कि अच्छे से अच्छे कार्य में लगे। लेखा और प्रबंध के अलावा भी वह लंगर में हर तरह की सेवा करता रहता था। वह सारा दिन और देर रात तक इसी सेवा में जुटा रहता था। साथ ही वह हर समय वाहिगुरू का नाम जपता रहता था। वह गुरू कर लंगर की सेवा सारा जोर लगा कर करता। लंगर तैयार करता और आए-गए को प्रसाद छकाता परन्तु वह स्वयं लंगर का प्रसाद न ग्रहण किया करता।

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उसने किसी को भी यह पता नहीं लगने दिया कि वह भोजन कैसे करता है, क्या खाता है और कहाँ से खाता है? भाई जोध देवता इस तरह करता था कि जब संगत प्रसाद छक जाती, तो वह झूठी पत्तलें उठवा कर एक साफ जगह रखवा देता। जब लंगर हो चुकता, भाई जोध ने इन झूठी पत्तलों में से पेट भरने लायक अन्न एकत्र कर लेना और वाहिगुरू का नाम ले कर ग्रहण कर लेना। कितने ही समय तक वह इस तरह संगतों का शीत प्रसाद अर्थात जूठन खा कर गुजारा करता रहा। जब यह बात गुरू जी तक पहुँची तो गुरू जी ने उसे बुलाया और प्यार से पूछा, ‘जोध भाई ! तुम प्रसाद (अन्न) कहाँ से छकता (खाता) है?’

जोध – ‘सच्चे पातशाह ! आप जी के लंगरों से ही पेट भरने लायक रहमत मिल जाती है। संगतें द्वारा पत्तलों में छोड़ा अन्न खा लेता हूँ।’

गुरू जी – ‘जोध भाई ! ऐसा क्यों ? तुम इस तरह का भोजन क्यों खाते हो? शुद्ध प्रसाद क्यों नहीं छकता?’

जोध – ‘सच्चे पातशाह ! मेरे अंदर जाति के अहंकार का भूत रहता था। इसको निकालना था। भूत को जूठन ही खिलानी ठीक थी। यह ऐसे ही काबू में आना था। मैं चाहता था कि जाति अहंकार का यह भूत दूर हो जाये और मैं स्वयं को साध संगत का विनम्र सेवक समझने लगूं।’

गुरू जी – ‘तुम्हारा जाति-अहंकार अब दूर हो गया है। अब इस तरह करना बंद कर दो। तुम्हारा मन साफ और शुद्ध हो गया है। अब इसमें भूत नहीं रहता। अब इसमें वाहिगुरू का घर है, उसे शुद्ध अन्न भेंट करना चाहिए।’ यह कह कर गुरू जी ने भाई जोध को अपने पास बिठाया और लंगर से शुद्ध प्रसादा मंगवा कर छकाया।

इसके बाद में भाई जोध गुरू कर लंगरों प्रसाद छकने लगा। हर समय सेवा करता और नाम जपता रहता। मन नाम में लगा रहे और शरीर सेवा में उसका मन सुख और शान्ति से भरपूर हो गया, संगत उसे भाई जोध देवता कह कर पुकारने लगी। उसका यही नाम पक्का हो गया। वह गुरू अंगद देव जी के बड़े प्रमुख सिक्खों में गिना जाने लगा। भाई गुरदास जी ने उसका नाम उस समय के चोटी के सिक्खों में लिखा है। वह लिखते हैं –

जोधु रसोईआ देवता गुर सेवा करि दुतरु तारी।
पूरै सतिगुर पैज सवारी। (वार 11, पौड़ी 15)

शिक्षा – हमें भी भाई जोध की तरह अपने अंदर से अहंकार और जाति अभिमान के भूत को निकाल देना चाहिए जिससे हमारे मन में भी शान्ति हो सके और वाहिगुरू का निवास मन में हो सके। गुरबाणी में गुरु तेग बहादुर जी ऐसा फरमाते है – जिहि प्रानी हउमै तजी करता रामु पछानि ॥ कहु नानक वहु मुकति नरु इह मन साची मानु ॥ जिस मनुष्य ने करतार सृजनहार के साथ गहरी सांझ डाल के (अपने अंदर से) अहंकार त्याग दिया, हे नानक! कह- हे मन! ये बात सच्ची समझ कि वह मनुष्य (ही) मुक्त है।

Waheguru Ji Ka Khalsa Waheguru Ji Ki Fateh
– Bhull Chuk Baksh Deni Ji –

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