Saakhi – Guru Gobind Singh Ji Or Sikhon Ka Pakhand

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Saakhi - Guru Gobind Singh Ji Or Sikhon Ka Pakhand

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Saakhi - Guru Gobind Singh Ji Or Sikhon Ka Pakhand

ਪੰਜਾਬੀ ਵਿਚ ਪੜ੍ਹੋ ਜੀ 

गुरू गोबिन्द सिंह जी और सिक्खों का पाखंड

विसाखी के समय श्री अनन्दपुर साहब में सतगुरु गोबिंद सिंह जी के दरबार में कुछ प्रेमी सिक्ख गुरू दर्शनों को आए। कई दिन सुबह-शाम कीर्तन और गुरू वचन सुन कर निहाल होते रहे। एक दिन उन्होंने सतगुरू जी के चरणों में उपस्थित हो विनती की, सच्चे पातशाह! हमारे कोई पिछले अच्छे कर्म हैं जो आप जी के दर्शन हमें प्राप्त हुए हैं। आप जी ने हमें सिक्खी की दान बख्शीश की, हम आप जी के तन-मन से सिक्ख हैं। यह पिछले चार-पाँच दिन तो हमने बैकुंठ (स्वर्ग) में ही बिताऐ हैं। अगला बैकुंठ तो हमनें नहीं देखा। पर जो चार दिन आप जी के चरणों में रह कर आप के दर्शन कर, कीर्तन सुन कर, हमारी आत्मा को शान्ति और आनंद प्राप्त हुआ है, हमारा यह समय कई बैकुंठों के आनंद से भी अच्छा व्यतीत हुआ है। हमारा मन तो घरों को वापिस जाने को नहीं कर रहा लेकिन कारोबार, काम-काज के चलते जाना ही पड़ता है, अत: आप जी अब हमें वापस जाने की आज्ञा प्रदान करें।

सतगुरु जी मुस्कुराए और कहने लगे, भाई गुरसिक्खो ! मनुष्य संसार में शारीरिक सुख और मन की शान्ति प्राप्त करने के लिए कोई तप करता है, कोई जप करता, कोई धूणें तापता है, कोई घर परिवार छोड़ बाहर जंगलों में जाता है। आप बड़े भाग्य वाले हो जिनको संगत में आ कर सुख और शान्ति प्राप्त हुई है।

स्वर्ग और बैकुंठ की प्राप्ति के लिए कोई अश्वमेध यज्ञ करता है, कोई सोने, चाँदी, भूमि का दान करता है, कोई कठिन साधना करके शरीर को कष्ट में डालता है। आप धन्य हो, जिनको बैकुंठ का आनंद प्राप्त हुआ है। हम आपको सलाह देते हैं कि जहाँ आपने चार दिन शान्ति के साथ व्यतीत किये और बैकुंठ का आनंद प्राप्त किया, ऐसे समय प्रभु मेहर और भाग्य से ही प्राप्त होते हैं। आप आठ दिन ओर स्वर्ग का आनंद लो और मन की शान्ति प्राप्त करो, गुरू भली करेगा। घरों के काम कार कभी रुकते नहीं, वह तो चलते ही रहते हैं परन्तु ऐसा समय जिंदगी में कहीं विरला ही प्राप्त होता हैं अत: आप इस बैकुंठ का आनंद कुछ समय ओर ले लीजिए।

सतगुरुजी का यह वचन सुनकर सिक्खों के चेहरे मुरझा गए और बेमन से सत्य वचन कहा और अपने-अपने ठिकानों की ओर चले गए। क्योंकि सिक्खों ने सतगुरू जी के सम्मुख जो वचन बोले थे वैसी वृति (अवस्था) उनकी अभी बनी नहीं थी। सभी इकठ्ठा हो आपस में विचार करने लगे कि हम तो अच्छे अजीब स्थिति में फंसें हैं। आठ-आठ दिन घरों से निकलों को हो गए हैं। अब सतगुरू जी ने आठ दिन ओर यहाँ रहने के लिए हुक्म कर दिया है।

उन्होंने एक दो दिन बड़ी मुश्किल से बिताए और उन्हें फिर से अपनें घरों, बच्चों की याद तंग करने लगी। एक-एक दिन महीने समान व्यतीत होने लगा। दूसरी तरफ सतगुरु जी ने अनन्दगढ़ किले के पहरेदारों को बुला कर सख्ती के साथ कह दिया कि आपको इन सिक्खों का खास ध्यान रखना है। हमारी इजाजत के बिना यह सिक्ख किले में से बाहर न जाने पाएँ।

वे सारे सिक्ख जो कहते थे कि सतगुरू जी ! आपके दर्शन कर, वचन विलास और कीर्तन सुन कर हमें बैकुंठ से भी ज्यादा आनंद आता है, उन्होंने बड़ी मुश्किल से चार दिनों का समय बिताया। सभी ने इकठ्ठा हो कर आपसी सलाह मशवरा किया कि अगर हमनें बाकी के चार दिन भी कठिनाई उठा कर काट लिए, लेकिन जब हमनें सतगुरु जी से घरों को जाने की आज्ञा माँगी, अगर सतगुरू जी ने फिर से आठ-दस दिन और रहने को कह दिया, फिर क्या करेंगे? सतगुरू जी को हम ना नहीं कह पाएंगें तथा जबरदस्ती हम किले से बाहर निकल नहीं सकते, पहरा बहुत सख्त है। अब हमें कोई तरकीब (योजना) लगाकर ही किले से बाहर निकलना पड़ेगा।

काफी विचार विमर्श के बाद सभी इस बात पर सहमत हुए कि हम अपनें में से किसी एक को मुर्दा बना लें और उसे अर्थी पर डाल लें। चार लोग उसे उठा लेंगे। एक व्यक्ति आगे तथा दो व्यक्ति पीछे चल पड़ेंगे। आगे वाला सिक्ख ‘राम राम सत है, हर का नाम सत है’ कहता जाएगा अगर पहरेदार पूछेगा कि किधर चले हो, तो कह देंगे कि गुरू का अति प्यारा सिक्ख रात पेट दर्द होने के कारण ‘राम सत’ हो गया है। उस का दाह संस्कार करने के लिए बाहर जा रहे हैं।

अत: सारी योजना बनने के बाद दिन चढ़ते ही रात को बनाई योजना मुताबिक एक सिक्ख को मुर्दा बना ऊपर सफेद कपड़ा डाल, स्वयं को सिदकी (पक्के) सिक्ख कहलाने वाले सिक्ख, ‘राम-राम सत है’ कहते और ‘सेवक क्या ओड़कि निबही प्रीति’ शब्द पढ़ते हुए किले के दरवाजे के पास पहुँचे। दरबान सिक्ख ने पूछा कि क्या हुआ? किधर चले हो? सिक्खों बताया कि रात को हमारा साथी सिक्ख जो बहुत गुरू प्रेमी था, अचानक पेट दर्द होने के कारण ‘राम-सत’ हो गया है, जिसके मृत शरीर को अंतिम संस्कार के लिए बाहर लेकर जा रहे हैं।

दरबान ने सभी को रोक लिया और दूसरे सिक्ख को सारी घटना सतगुरू जी को बताने के लिए भेजा। उस सिक्ख ने कलगीधर पातशाह जी के चरणों में विनती की, पातशाह! रात को आप जी का एक बहुत प्यार वाला सिक्ख पेट दर्द होने के कारण अकाल चलाणा (स्वर्गवास) कर गया है। उसके शरीर का अंतिम संस्कार करने के लिए सात-आठ सिक्ख उसका बिबाण (अर्थी सजा) बना कर बाहर ले जाने के लिए किले के दरवाजे पर खड़े, ‘सेवक की ओड़कि निबही प्रीति’ शब्द पढ़ रहे हैं, आप जी की क्या आज्ञा है?

सतगुरु जी ने विनती करने आए सिक्ख से कहा, ‘ऐसा गुरू के प्यार वाला सिदकी सिक्ख अगर अकाल चलाणा कर गया है तो उसका अंतिम संस्कार हम अपने हाथों किले में ही करेंगे। बाहर भेजने की जरूरत नहीं है बल्कि उनको वापस किले में ले आवो और चिता सजाओ, हम भी जल्दी ही आते हैं।

दरबान सिक्ख ने वापस आ बनावटी मुर्दे के वारिसों को सतगुरू का संदेश देते हुए बताया कि सतगुरू जी का हुक्म है कि ऐसे सिदकी सिक्ख का संस्कार बाहर नहीं करना है, हम किले के अंदर ही उसका संस्कार अपने हाथों करेंगे। मुर्दे को वापस ले आवो, यह सतगुरू का हुक्म है।

दरबान के मुंह से यह संदेश सुन कर पाखंड रचाने वालों को डर से पसीना आ गया, सभी मन ही मन सोचने लगे कि अब क्या करेंगे? हमारी बनाई योजना हमें ही उलटी पड़ गई है। जाणी-जान (सर्वज्ञ) सतगुरु जी के आगे हमारा भेद खुल जाएगा और दूसरे सिक्ख भी हमें लाहनतें (फिटकारेंगे) देंगे कि इन्होंने किले से बाहर जाने के लिए यह क्या पाखंड रचा है? इसी सोच में छाती पर पत्थर रख कर फिर से ‘राम नाम सत’ करते वापस किले में आ गए और अर्थी रख दी।

दूसरी ओर श्री कलगीधर जी भी सिक्खों सहित पहुंच गए। उनकी तरफ देख कर मुस्कराए और पूछा, सिंहो! इसकी मौत किस तरह हुई है? दो सिक्खों ने बताया, पातशाह! रात को यह सिक्ख लंगर ग्रहण कर सोया, सुबह-सुबह इसके दर्द हुआ। थोड़ा दुआ दारू जो हमारे पास था, इसको दिया परन्तु आराम आने की बजाय यह राम सात हो गया, कह कर दोनों रोने लगे।

सब कुछ जानने वाले सत्तुरू जी ने सभी को दिलासा दिया और एक सिक्ख को कहा कि लकड़ी को को रूईं बांध, तेल डाल कर आग लगा लाए जिससे कि तसल्ली कर ली जाये कि सिक्ख वास्तव में चढ़ाई कर (मर) गया है, कहीं जीवित ही न जल जाये। गुरू हुक्म मान सिक्ख लकड़ी को रूईं बांध, तेल के साथ भिगो कर आग लगा लाया। सत्गुरू जी ने हुक्म किया कि इस मुर्दे को चिता पर बाद में रखेंगे, पहले इसके पैरों को आग लगा कर तसल्ली कर लो कि सिक्ख वास्तव में ही राम सत हो गया है।

सतगुरु जी का हुक्म मान कर जब सिक्खों ने मुर्दो के पैरों को मशाल लगाई तो वह अर्थी से उठ कर दौड़ गया। यह चमत्कार देख कर सतगुरू जी और सारी संगत हँसने लगी और वह सिक्ख जिन्होंने यह पाखंड रचा था सतगुरू जी के चरणों में गिर पड़े और रो-रो कर माफी माँगने लगे कि सतगुरू जी हमारी आस्था डोल गई जिसके चलते यह गलती हो गई। हमें घर के काम काज और परिवार के मोह ने अत्यंत दु:खी कर दिया था और इसके अलावा हमनें सोचा कि कहीं सतगुरू जी आठ दिन ओर ठहरने के लिए हुक्म न कर देने, जिसके हमनें बाहर निकलने के लिए पाखंड रचा था।

सतगुरू जी ने उन सिक्खों की विनती सुन कर वचन किया, सिक्खो ! गुरू हमेशा बख्शिंद (माफ करने वाला) है। गुरू को आपके रहने या जाने से कोई फर्क नहीं पड़ेगा परन्तु आप ही यह कहते थे कि हमें संगत में रह कर कीर्तन सुन कर बैकुंठ के आनंद से भी ज्यादा आनंद की प्राप्ति हुई है, दरअसल यह सारा कुछ आपके कहने मात्र ही था। अगर आपको ऐसी अवस्था प्राप्त हुई होती तो आप ऐसा पाखंड न करते।

एक तरफ तो आप गुरू को सर्वज्ञ और अंतरयामी कहते हो। दूसरी तरफ आप गुरू को अपने जैसा मनुष्य समझ कर उसे धोखा देने के लिए बहाना बनाते हो। हम तो अंदर और बाहर से एक नमूने के पक्के सिक्ख बनाने हैं परन्तु आप तो सिक्ख बन कर गुरू के आगे ही छल-कपट का प्रदर्शन करने लग गये। सतगुरू के वचन सुनकर आस्था से डोले इन सिक्खों ने गुरू चरणों पर माथा टेक माफी माँगी और भविष्य में अंदर और बाहर से एक जैसे होने का वादा गुरदेव जी के साथ किया। सतगुरू जी ने अपने बख्शिंद स्वभाव अनुसार, सिक्खों को क्षमा कर, अंदर से खोट निकाल, सिक्खी में आस्था की बख्शिशें कर विदा किया।

शिक्षा – बनावटी दिखावा बहुत देर तक साथ नहीं देता। फिर ऐसे गुरू के आगे, जो गुरसिक्खों को बार-बार यह दृढ़ करवाता है कि हे गुरसिक्खो ! आप अपने अंदर से झूठ-कपट, छल-फरेब को दूर कर हरी नाम का जप करो तब तुम गुरू नजर और मेहर से निहाल, निहाल, निहाल हो जाओगे।

Waheguru Ji Ka Khalsa Waheguru Ji Ki Fateh
– Bhull Chuk Baksh Deni Ji –

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