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Saakhi- Mata Kaulan Ji (Hindi)

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Saakhi- Mata Kaulan Ji (Hindi)

Saakhi- Mata Kaulan Ji (Hindi)Saakhi- Mata Kaulan Ji (Hindi)

साखी माता कौलां जी

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माता कौलां जी लाहौर मुझंग निवासी काजी रुस्तम खां की बेटी थी। इसी गांव में पूर्ण सूफी संत सांई मीर जी भी निवासी करते थे। माता कौलां जी को सांई मींआ मीर जी की संगत में रहते हुए श्री गुरु हरिगोबिंद साहिब जी के दर्शन करने का सौभाग्य भी प्राप्त हुआ।

जिसके चलते आपका गुरुबाणी से अथाह प्रेम हो गया। माता कौलां जी दिन रात श्री गुरु अरजन देव जी की रचना पावन बाणी श्री सुखमनी साहिब पढ़ते रहते थे। गुरुबाणी पढऩे और गुरुघर से जुड़ाव देख कर काजी ने उनकी मौत का फतवा दे दिया। जब सांई मीआं मीर जी को इस बारे में पता चला तो उन्होंने अपने अनुयायी अब्दुल्ला शाह के साथ माता कौलां जी को श्री गुरु हरिगोबिंद साहिब जी की शरण में भेज दिया।

निआसरों के आसरे गुरु जी ने माता कौलां जी का गुरुघर से अथाह स्नेह व श्रद्धा देखते हुए श्री अमृतसर साहिब में रुकने का प्रबंध करवाया। जहां माता जी के रुकने का प्रबंध किया गया इस स्थान का नाम पहले फूलों की ढाब हुआ करता था जहां अब गुरुद्वारा व सरोवर कौलसर साहिब बना हुआ है। यहां पर माता कौलां जी ने अपना सारा जीवन सिक्ख असूलों अनुसार नाम सिमरन करते हुए बिताया।

माता जी ने एक दिन गुरु हरिगोबिंद जी को आगे वंश निशानी के तौर पर पुत्र का संकल्प किया जिसे गुरु साहिब ने अपनी बख्शीश सदका ज्ञान देकर मिटा दिया। गुरु जी ने माता जी से कहा कि हम आपको ऐसा पुत्र बख्शेंगे जिससे आपका नाम जगत में अमर रहेगा। इसके बाद गुरु जी ने बाबा बुढ़ा जी को माता कौलां जी के नाम पर सरोवर खुदाई का काम सुपुर्द किया और माता कौलां जी से कहा कि इस सरोवर का नाम कौलसर रखा जाएगा, आप इसे ही अपना पुत्र समझें।

Gurudwara Kaulsar

यह सरोवर 1624 ई. से 1627 ई. तक बाबा बुढ़ा जी ने अपनी निगरानी के तहत तैयार करवाया और गुरु साहिब ने सिक्खों को सचखण्ड श्री हरिमंदिर साहिब सरोवर में स्नान करने से पहले इस सरोवर में स्नान करने का हुक्म किया। यह है गुरु साहिब जी की बिरद, अपने भक्तों और हुकुम मानने वालों को स्वयं से ज्यादा सम्मान देना। कुछ समय बाद माता जी करतारपुर जा कर रहने लगे। जहां उन्होंने अपना अंतिम समय निकट जानते हुए छठे पातशाह श्री हरिगोबिंद सिंह जी को मिलने का संदेश भेजा, जिसके बाद गुरु साहिब संगत सहित करतारपुर पहुंचे। सुबह शाम कीर्तन दरबार सजने लगे।

1629 ई. में माता कौलां जी नाम सिमरन और बंदगी करते हुए अकालपुरख के चरणों में जा विराजे। गुरु साहिब ने माता कौलां जी को गुरुघर का सेवक जानते हुए उनका अंतिम समय स्वयं संभाला।

शिक्षा : हमें इस साखी से यह शिक्षा मिलती है कि सतगुरु शरण में आने वालों की हमेशां लाज रखते हैं और अपनी बख्शिश से सदियों तक का मान-सम्मान देते हुए गुरुघर के सेवकोंं का नाम धरा पर अमर कर देते हैं।

वाहेगुरु गुरु जी का खालसा वाहेगुरु जी की फ़तेह 
— गलती से रह गई किसी भी भूल के लिए क्षमा प्रार्थी है —

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